Friday 16 July 2010

मुरली को यूँ न जाने दें...

बहुत कुछ नहीं लिखा गया, जिसका लिखा जाना जरूरी था। हम मुरलीधरन को ऐसे विदा नहीं कर सकते। उनमें जो बात थी, वह आने वाले वक्त के क्रिकेट खिलाडिय़ों में कभी भी होगी, इसमें मुझे संदेह है। मुरली श्रीलंका की शान रहे। अगर गलत नहीं हूं तो भारत के दामाद हैं। उनकी जिस खास बात और छवि को मैं इंगित कर रहा हूं, वह अलग तरीके से समझी जा सकती है। अगर कुछ नाम लिए जाएं तो मन में क्या उभरता है? सोचना।

कर्टली एंब्रोस, कर्टनी वॉल्श, वसीम अकरम, वकार युनूस, इमरान खान, रॉबिन सिंह, अजय जडेजा, जोन्टी रोड्स, हैंसी क्रोन्जे, एंडी फ्लॉवर, राहुल द्रविड़, सचिन तेंदुलकर, एलन डोनाल्ड, शॉन पोलाक, ग्लेन मैक्ग्राथ, मार्क वॉ, स्टीव वॉ, अनिल कुंबले, शेन वॉर्न और मुथेया मुरली धरन। ये सिर्फ कुछ एक नाम हैं। मगर ये सिर्फ नाम भर नहीं है। इनके साथ मेरी जिंदगी जुड़ी हुई है। मेरी जिंदगी के अमूल्य पल। इनकी छवियां मेरे लिए एक पूरे दौर को इंगित करती हैं। उस दौर को, जिसमें मैं 14 साल का था, या 9 साल का था, या 11 साल का था, या 16 साल का था। जब मैं कर्टली एम्ब्रोस का नाम लेता हूं, तो उसी के साथ एक 7 साल फुट लंबा और बड़े-बड़े होठों वाला एक कूल अश्वेत गेंदबाज मस्तिष्क में कहीं उभरता है। उसके दौडऩे, दौड़कर आने, गेंद फैंकने और बल्लेबाज के बल्ला घूमाने के बाद प्रतिक्रिया व्यक्त करने का अंदाज एक नायकीय तत्व का निर्माण करता था। उस नायकीय छवि से ही तो एक फिल्म सी दिमाग में बनती जाती थी। सोचते थे कि यार, ये देखो कर्टली एम्ब्रोस आ गया दौड़ता-दौड़ता। अब देखना गोला फैंकेगा। बेट्समेन तो गया। ऐसे में अगर सचिन जैसा बल्लेबाज चौका या छक्का मार देता, तो बल्लेबाज नायक बनकर उभरता। कि, यार क्या मारा है। कमाल कर दिया। समझने की बात ये है कि तब मैच के दौरान समानांतर रूप से दिमाग में फिल्म बनती चलती थी, हमारे व्यक्तिगत हीरो और विलेन होते थे, समानांतर ही जहनों में एक फैंटेसी चला करती थी और फिर एक-एक गेंद आनंदोत्सव बनती जाती थी। आज वह बिल्कुल गायब है। बिल्कुल ही गायब है।

रॉबिन सिंह क्या 'एंग्री यंग मैन यट सोबर जेंटलमेन' लगते थे। धांसू फील्डर यानी गर्व किए जा सकने वाले क्षेत्र रक्षक। आज गिना दो एक भी। वो रॉबिन सिंह, अजय जडेजा, जोन्टी रोड्स, शॉन पोलाक जैसों की ब्रीड, वो प्रजाति आज कहां है। कहीं नहीं। रॉबिन सिंह सिर्फ खेलते थे, और क्या खेलते थे। बड़े शॉट्स ज्यादा नहीं मारते थे, मगर एक-एक, दो-दो से ही जीता जाते थे। क्रूशल टाइम यानी परीक्षा की घड़ी में कैच लपक लेते थे। कद-काठी में हमारे घर के ही किसी काका जैसे लगते थे। एक ऐसे आदमी की तरह जैसे जो गली में हमारे पास से गुजर जाए और हमें पता भी नहीं चले। यहीं तो बात थी। आज क्रिकेटरों से हमारी दूरियां असीमित रूप से बढ़ गई है। उनसे हमारा कोई नाता नहीं लगता। वे लोग तो आसमान में जा बैठे हैं, हम वहां तक नहीं पहुंच सकते। रॉबिन सिंह और कर्टली एंब्रोस जमीन पर ही रहते थे। हमारे बीच के थे।

ऐसे एक-एक खिलाड़ी के नायकीय तत्वों पर बातें करते हुए आगे बढ़ा जा सकता है। उन्हीं में से एक नाम मुथैया मुरली धरन का है। जमीनी आदमी। फिरकी का अंदाज भी ठेठ देसी लगता था। कद-काठी औसत से भी औसत। दर्शक दीर्घा में दर्शक बनकर बैठ जाए तो कोई कंधे पर हाथ मारकर बोल बैठे यार मुरली होता तो ये विकेट यूं ले जाता। मुरली की गेंद क्या घूमा करती थी। कभी कभी तो 45 से 60 डिग्री तक भी। एकदम चक्करघिन्नी की भांति। बेट हाथ में लेकर खड़े खिलाड़ी भी सोचते कि ये दैत्य कहां से आया है। कहीं श्रीलंका के पौराणिक किरदार रावण जैसी ही कुछ अदृश्य शक्तियां तो नहीं हैं इसमें। हम बच्चों के मन में तो रावण से मुरली की शक्तियों को जोड़कर देखने की फंतासी हर मैच में होती रहती। टीम के अन्य 10 खिलाड़ी एक तरफ और मुरली एक तरफ। फिर जब कभी सुनते की नवजोत सिंह सिद्धू ने एक दौरे में मुरली की गैंदों को खूब सीमा पार पहुंचाया, तो सिद्धू के प्रति मन में नायकीय तत्व और श्रद्धा पैदा हो जाती।

आज जब मुरली धरन क्रिकेट से सन्यास लेने की बात कह ही चुके हैं, तो ये सभी दौर, सभी नायकीय छवियां, सभी यादें जीवित की जानी जरूरी है। बेहतर हैं, सभी बच्चे अपने बचपने को जोड़कर देखें और याद कर लें। कि कैसे टीवी के सामने बरसात के दिनों में बैठते थे। सामने हॉल का दरवाजा खुला होता था। खिड़की खुली होती थी। बरसात आ रही होती थी। शाम के 4 बजे, श्रीलंका-भारत का मैच स्टार स्पोर्ट्स पर और कभी भारत-वैस्टइंडीज पर मैच ईएसपीएन आ रहा होता था। मां 'अदरक-इलाइची-काली मिर्च-गाय के ताजे दूध' से बनी गर्म-गर्म चाय लाकर देती थी। साथ में कभी घी में सेंकी हुई ब्रेड होती थी, तो कभी बेसन के 'हरी मिर्च-प्याज-आलू' के पकौड़े होते थे। फिर चाय की चुस्कियों और नमकीन पकौड़ों के साथ मैच चलता। मैच के साथ चलती नायकीय छवियों वाली फिल्में। मन में। नसें खून को तेज दौड़ातीं, खून खौलता, दिल में खुशी का करंट प्रवाह दौड़ जाता, मौहल्ले भर से आवाजें आती रहती। आनंद ही आनंद। आज जिंदगियां हमें गंभीर और चिंतित करने पर तुली हैं। चाय-पकौड़े और मैच वाली यादों के साथ भाई-बहनों की लड़ाई, मां के हाथ झाड़ू से पिटाई, दोस्तों के साथ मैच से पहले या बाद में खेल-खिलाई, पिता के घर में प्रवेश करने पर भाग-भगाई और साथ धक-धक दौड़ता मैच का स्कोर जैसी अप्रतिम यादें भी हैं। अब इन्हें याद करने का स्वर्ग सुख क्यों जाने देते हैं? मुरली जा रहे हैं। जैसे एंब्रोस, वॉल्श, रोड्स, सिंह, क्लूजनर और कुंबले चले गए। जैसे आज कठिन है, उनके दौर से जुड़ी हमारी यादों को टटोल पाना। तो मुरली के वक्त से जुड़ी यादों को तिजोरी में से निकालकर धूप में सूखने दीजिए और अपनी ही दिमागी फिल्मों में खो जाइए।

गजेन्द्र सिंह भाटी

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