Thursday, 3 December 2009

'पैसा-पैसा और मर्दों की गोरा होने वाली क्रीम'

'वह 1978 का बरस था। मैं उत्तर प्रदेश के बलिया जिले से दिल्ली आया था। यहां औखला इंडस्ट्रियल एरिया में बल्ब बनाने की एक फैक्ट्री में काम करने लगा। कुछ साल बाद नौकरी छोड़ कर यहीं पर चाय-तंबाकू की एक दुकान खोल ली। ' कहते हुए रामलखन के चेहरे पर पूरी आत्मीयता झलक रही है। चाय बनाने और यहां-वहां लोगों को चाय की गिलास पकड़ाने की व्यस्तता में भी वह पूरे धैर्य से मेरे सवालों के जवाब दे रहा है। करीब 45-50 का लगने वाला रामलखन आगे कहता है, ' उस वक्त मुझे 140 रुपये महीना मिलते थे। और , उसमें मैं बहुत ही खुश रहता था। आज यहां 20,000 रुपये महीना पाने वाले लोग चाय पीने आते है, तो भी उनके चेहरे पर वह खुशी नहीं नज़र आती ' रामलखन बताता है कि यहां खाना खाने के लिए तब एक चावला होटल था। आज भी है। वह कहता है, 'तब दो रुपये में मैं भरपेट अच्छा खाना खाता था। मगर वह वक्त बदल गया। ......जब इंदिरा गांधी मरी तो दिल्ली में पालक 20 रुपये किलो बिका। ' मैंने पूछा कि उससे पहले पालक क्या भाव था? उसका जवाब आता है ....यही कोई 2-3 रुपये किलो।

एक बार गूगल पर डीटीसी यानी दिल्ली परिवहन निगम के बारे में कुछ ढूंढ रहा था। उस वक्त यह जानकर बड़ी खुशी हुई कि इसकी रिंग रोड़ सेवा सिर्फ 10 रुपये में विश्व के सबसे लंबे रुटों में एक रिंग रोड़ का चक्कर लगाने वाली अकेली सेवा है। इतनी सस्ती सुविधा दुनिया में और कहीं नहीं थी। संभवत: अब भी नहीं होगी। कुछ वक्त पहले इसकी टिकट दरें बढ़ी। 5, 10 और 15 रुपये की नई दरों पर पहले दिन बसों में खूब हो-हल्ला हुआ। बिहार मूल के मेरे मित्र आशीष प्रभात मिश्रा एक कारोबारी अखबार में नौकरी करते हैं। पहले जहां 5-5 रुपये में दो बसें बदल कर आशीष अपने बसेरे पहुंच जाते थे, आज वह दर 10-10 रुपये हो गई है। दरें बढऩे पर उन्हें मीडिया और स्थानीय नेताओं के रवैये पर बहुत दुख हुआ। उनका कहना था,' ऐसा लगता है, दिल्ली के नेताओं को फिर से चुनाव में खड़ा नहीं होना है। अगर ऐसा नहीं होता, तो बिना सार्वजनिक संवाद और सलाह के सार्वजनिक परिवहन को यूं गरीब की पहुंच से परे नहीं किया जाता। ' मीडिया पर बरबस फट पड़ते आशीष कहते हैं,' अखबार वालों ने इस मुद्दे पर उस गरीब का साथ देना गवारा नहीं समझा, जिसकी जेब में महंगाई ने वैसे ही डाका डाल रखा है। दाल की कीमतें 100 रुपये से jyada हैं। वह दाल जो सबसे कमतर और गरीबों का भोजन मानी जाती है। अखबारों में कोई आलोचनात्मक खबर नहीं है। ' आशीष कहते हैं,' देख रहे हैं.... कमजोर विपक्ष होने से क्या होता है? '

गूगल की घोषणा भी तो आई है। अब से संभवत: गूगल पर खबरें पढऩे के लिए लोगों को प्रति खबर पैसे चुकाने होंगे। पानी, मिट्टी, हवा, अक्षर, पेड़, खून, इज्जत, शक्ति, सुविधा, चिता की लकडिय़ां, भगवान और अब गूगल.....क्या रह गया है, जो बिन पैसे अब मिलता हो? और फिर अक्षय कुमार भी तो हिप-हाप अंदाज में नाचते हुए कटरीना से कहते हैं, 'पैसा-पैसा करती है, तू पैसे पे क्यों मरती है। क्या रक्खा है पैसे, में पैसे की लगा दूं ढेरी...। मैं बारिश कर दूं, पैसे की, जो तू हो जाए मेरी। '

जाहिर है, कटरीना तो उनकी हो ही जाएगी। लाल किले के पास से बदरपुर बार्डर की ओर लौट रहा था, कि बगल में बैठे बंगाली मूल के एक भाई से बातें हुई। बिल्कुल अलग ही सवाल करने के अंदाज में उसने पूछा, 'आप कहां के रहने वाले हैं? ' मैंने कहा राजस्थान का। उसने फिर पूछा, 'वहां आटा क्या भाव मिलता है? ' मैंने कहा, यही कोई 14-15 रुपये किलो। उसने कहा, '..और दिल्ली में... दिल्ली में 20 रुपये से नीचे खाने को आटा नहीं मिलता है। बस का भाड़ा बढ़ गया है। दाल भी खा नहीं सकते हैं। यहां की सरकार गरीब को बस जीने ही नहीं देना चाहती है। बंगाल में ऐसा कभी नहीं होता। अगर ये मंहगाई और भाड़े में बढ़ोतरी बंगाल में हुई होती तो लोग सरकार की हालत खराब कर देते। ' पूछने पर उस भाई ने बताया कि उसे दिल्ली में आए हुए करीब 13-14 साल हो गए हैं। यहां वह भोगल में रहता है। उसके जैसी प्रतिक्रिया वाले दिल्ली में बहुत से और हैं।

भाड़ा बढऩे के 2-3 दिन बाद की बात है। मैं आंनद विहार से काले खां आईएसबीटी आ रहा था। बस हर स्टैंड के बाद खचाखच भरती जा रही थी। भीड़ भरी बस में एक आदमी अपनी पत्नी और तीन बच्चों के साथ चढ़ा। दिल्ली के दानवाकार महानगर होने से घबराया और कुछ सहमा यह आदमी जैसे-तैसे बस में अपने परिवार को चढ़ा पाया। अपनी कर्कश आवाज और बुरेव्यवहार के साथ कंडक्टर आया। आदमी ने कंडक्टर को दस रुपये का नोट देते हुए दो टिकट मांगी। पता नहीं उस वक्त उस पर क्या बीती होगी, जब कंडक्टर ने कहा, '10 नहीं 30 रुपये निकाल। ' अब बाकी सभी के लिए 30 रुपये जायज नजर आते हो, मगर उस आदमी ने तो यह सोचा ही कि दस रुपये में वह अपनी बीवी और बच्चों के साथ सफर पूरा कर लेगा। उसका दिल बैठ गया। जेब के किस कोने से न जाने उसने 20 रुपये निकाल कर दे दिए। इसके बाद मालूम नहीं उसके पास और कुछ बचा भी था....... या नहीं?

आईटीओ, पुरानी दिल्ली, प्रगति मैदान, आईएसबीटी और मैट्रो जैसे शहर में कई बिंदु है, जहां तरह-तरह के फुटकर सामान के साथ ठेले वाले खड़े रहते हैं। नमकीन, पानी, चाय, मूंगफली, शकरकंद और रूमाल बेचते इन लोगों को एक-एक, दो-दो रुपये से ज्यादा का मार्जिन नहीं मिलता है। अब एक साथ 10-15 रुपये तक बढ़ रही सार्वजनिक सुविधाओं और महंगी होती चीजों का जवाब भला वह अपने एक-दो रुपये के मार्जिन से कैसे देगा। फिर ये बाद तो भूल ही जाइए कि कभी उसकी बेटी या बेटा कॉनवेंट स्कूल में जाएगा। ब्रांडेड कपड़े और जूते पहनेगा। बोतलबंद पानी पिएगा। गाड़ी में घूमेगा। वह तो बस अपने पिता की ही तरह चिलचिलाती धूप के नीचे अपने भाग्य की तरह काला होता जाएगा। और काला रंग भी तो समाज में स्वीकार्य नहीं है ना। 'ट्रैफिक सिग्नल ' के उस भीख मांगने वाले सांवले बच्चे की तरह हो सकता है वह भी 'मर्दों वाली गोरा होने की क्रीम लगाकर ' अपने तय भाग्य को बदलने की कोशिश करे।

गजेन्द्र सिंह भाटी

Tuesday, 9 June 2009

छमा....

छमा प्रार्थी हूँ।
महीनों से कुछ लिख नही पाया हूँ ।
कुछ वक्त और नही लिख पाउँगा।
स्नेह .... शुभाषीश... ।

गजेन्द्र सिंह भाटी

Friday, 13 March 2009

नागौर किले के सामने का चांदनी चौक

( जब पता चला कि नागौर में दो दिन का सूफी संगीत का एक बड़ा आयोजन होने वाला है। मैं अपने संस्थान से समय चुरा कर दो दिन के लिए राजस्थान आया। ख़ुद को रोक ही नहीं पाया। नागौर किले में ' सूफी दरबार ' का यह दूसरा साल था। इसमें ईरान, अफ्रीका, ईजिप्ट, कश्मीर, पंजाब, हैदराबाद और जयपुर समेत राजस्थान से ख्यात सूफ़ी फ़नकार शिरकत करने वाले थे।

चंद धनी पर्यटकों और 1000 रूपये की टिकिट खरीद सकने वाले कुछ आला रईसों की पहुँच ही इस सूफ़ीयाना मौसिकी तक थी। मेहरानगढ़ म्यूजियम ट्रस्ट के कर्ताधर्ता जोधपुर के महाराज गज सिंह जी, उनकी रानी, पुत्री राजकुमारी नंदिनी, भाई महाराज दिलीप सिंह, राजकुमार शिवराज सिंह, महेश बाबू और राजघराने के दूसरे सदस्य इसके आयोजन में शामिल थे। ब्रिटेन का हेलन हेमलिन ट्रस्ट और बनियन ट्री भी प्रायोजन में शामिल था। 31 जनवरी और 1 फरवरी को शाम 7 से 10 बजे तक नागौर के अहिछ्त्रगढ़ किले में यह महफ़िल सजनी थी।

अपने पिता की बदौलत मुझे भी रूमानियत और सूफ़ियत को देख -सुन -महसूस कर पाने का मौका मिलने वाला था। नागौर किले तक पहुँचने से लेकर सूफ़ी दरबार की आखिरी पेशकश तक मैंने क्या अनुभव किया ......हाज़िर है।
)



31 जनवरी 2009 , शाम 7 बजकर 05 मिनट
'मैं नागौर किले के सामने खड़ा इस इंतज़ार में हूँ कि एक परिचित सज्जन आए और मुझे अन्दर जाने की अनुमति दिलवा दें

" सदियों पुराने नागौर के अहिछ्त्रगढ़ किले का मुख्य दरवाज़ा ...सामने जीता-जागता भरा हुआ मैदान .....चारों तरफ़ बिख़री दुकानें , ठेले .......यहाँ-वहाँ बेतरतीब खड़ी गाड़ियाँ, स्कूटर, मोटरसाईकिलें, साईकिलें और फ़िज़ा में घुलती देस की इन गलियों में लिपटी धूल की महकीली गंध । "

कई गाय और बछिया तसल्ली से घूम रही हैं। एक गधा सामने से गुज़र रहा है। काठ की गाड़ी पर लकड़ी की प्लाई और बनियान में बैठे अपने मालिक को बिठाए।

किले के दरवाजे के एक ओर सामने कचरे का बदबूदार लोह ढाँचा रखा है । नगरपरिषद ने रखा होगा शायद .....सफाई व्यवस्था बनाए रखने को , मगर उड़-उड़कर नाक में आती इस सड़न को कैसे कैद किया जाए ।

पास ही में सफ़ेद मूर्ति में ढले गाँधी जी खड़े हैं। गले में मालाएँ हैं ...गैंदे के फूल की । आस-पास उड़ती धूल है, गाड़ियों का धुँआ है, और बदबू है। इस बसावट को गाँधी चौक कहते हैं। नागौर के सरकारी बस स्टैंड से आप यहाँ टेंपो या कहें तो ऑटो में बैठ कर पहुँच सकते हैं। सिर्फ़ तीन रुपये में.... ।

ज्यूस की दुकान में काम करने वाला 19-20 साल का एक लड़का झाड़ू निकाल रहा है । अपने दायरे के कचरे को सड़क के बीचों-बीच डाल रहा है। यहाँ कोई दायरा सड़क की हद के लिए तय नहीं है। जितना भाग छूट जाए ...चलने को ...वही सड़क है।

दिल्ली-६ के चाँदनी चौक की बात होती है । देश के भीतर घुसिए आपको कई चाँदनी-चौक नज़र आएँगे ।

इस गाँधी चौक के एक और 1956 में स्थानीय पत्थरों बना श्री नागौर पुस्तकालय है। सैयद सैफुद्दीन जिलानी रोड़ की तख्ती लगा दरवाजा है। इसके नीचे से गुजरती शाही ऐतिहासिक रोड़ आज एक संकरी लोकतान्त्रिक गली में तब्दील हो चुकी है। मेले का सा माहौल है।

नागौर सूफी दरबार कोंसर्ट होने को है। किले के कर्मचारी इस मुख्य दरवाजे के आगे चहल-कदमी कर रहे हैं। बातें कर रहे हैं।

पास में ही पुलिस चौकी है। लेकिन आज पुलिस की विशेष व्यवस्था है। बड़ी-बड़ी चमक-दमक से भरी गाड़ियों में बड़े और इज्ज़तदार लोग किले में प्रवेश कर रहे हैं। मैं बाहर खड़ा हूँ ......क्योंकि मैं बड़ा और इज्ज़तदार नहीं हूँ।

( जारी ....)

गजेन्द्र सिंह भाटी


Wednesday, 4 March 2009

गाँवों में इंसान अभी इंसान ही है ...

( राजस्थान के नागौर-जोधपुर सड़क मार्ग को जाते समय रास्ते एक छोटा सा तिराहा आता है। इसे गोगेलाव कहते हैं। यहाँ आबादी बहुत कम है। अपने ननिहाल पांचौडी को जाते हुए , मैं यहाँ बस का इंतज़ार कर रहा था। दिल्ली से 2-3 दिन की छुट्टी लेकर अपने नानोसा के देहांत के कुछ ही दिनों बाद पहली बार अपनी नानीसा से मिलने और शोक बाँटने जा रहा था। यहाँ गोगेलाव में बैठकर मैंने देखा कि ......)


30 दिसम्बर 2008, दो पहर के 3 बजकर 12 मिनट

" यहाँ गाँवों में इंसान अभी इंसान ही है .........मशीन नहीं बना। जिंदगी की रफ़्तार धीमी और चुस्त है। दिन यहाँ बड़े होते हैं ...और रातें भी बड़ी ।

तीन बुजुर्ग बैठे बी पी यानि ब्लड प्रेशर और मोबाइल पर बातें कर रहे हैं। इस पर कि इन उपकरणों का उनके जीवन पर पड़ने वाला प्रभाव क्या है ? बड़े शहरों के बच्चों को अगर इनकी बातें सुनाई दे तो ये वृद्ध उन्हें कनिष्ठ यानि इन्फिरिअर नज़र आयेंगे। शहरी बच्चे बेपरवाह होकर हँसेगें । यहाँ गोगेलाव स्टैंड से गुजरने वाली बसों के आने-जाने के समय में हुआ बदलाव , इनके बात करने से पता चल गया।

चारों ओर सुकून है। सुरक्षा का वातावरण है । किसी को कोई अफसोस नहीं है । पास में ग्राम पंचायत का नागौरी पत्थरों से बना ऑफिस है । एक-दो कमरों के इस पंचायत भवन पर छोटे आकार में मिनी सचिवालय लिखा है । यही कमरा सार्वजनिक पुस्तकालय भी है ।

सामने श्री श्री राधे प्रजापति मन्दिर है । पास से गुजरता राष्ट्रीय राजमार्ग शहरी गाड़ियों की आवाजाही से दमक रहा है । मगर महँगी गाडियाँ गुजारती ये सड़क परित्यक्ता सी लगती है।

अभी-अभी एक भोला-भाला युवक पचास ग्राम मोटे भुजिया एक अख़बार के टुकड़े पर लेकर खाने बैठा है । पिज्ज़ा-बर्गर का स्वाद इस युवक के लिए अभी गैर-जरुरी है । एक-एक कर के, धीरे-धीरे वह ब्रह्म सुखी एक भुजिया उठाता है और धीरे ही खाता है। ताकि जल्दी खत्म न हो । और खाली पेट को कुछ भरावट का एहसास हो ।"

गाँवों और उनके बारे में ऐसी बातें फिर कभी ........

गजेन्द्र सिंह भाटी

Tuesday, 2 September 2008

" क से कपड़ा , क से काया , क से कम "




गाँधी ने पगड़ी पहननी छोड़ दी । आधा दर्जन औरतें जितने कपड़े से अपना तन ढांप सके , उतना सिर पर लपेटे घूमना ... उन्हें घृणित लगा । गंगा घाट पर भीख मांगने वाली शबरी , भोर अंधेरे ही स्नान करती है, क्योंकि उसके पास दूसरी साड़ी नहीं है। अमेरिका से आयातित चीयरबालाएं नाम मात्र के ही कपड़े पहनती हैं , क्योंकि ज्यादा में आईपीएल की तौहीन होती है।

संसद और विधानसभाओं में सफ़ेद झक्क कपड़े पहन , एक दूसरे पर चप्पलें और माँ की गालियाँ बरसाने वाले गणमान्य नेता , चीयर बालाओं के कपडों को लेकर चिंतित हैं। भारत का धनी अंग्रेजीदां वर्ग , चीअर लीडर्स के डांस को अश्लील बताने वाले हिन्दी भाषी मध्यम वर्ग से परेशान है।

अमेरिका अपनी नाक पोंछकर जो कपडा सड़क पर फेंकता है हम उसे उठाकर गेंहू की बनी गर्म रोटियों के नीचे बिछाते हैं। आधी रात को होने वाली संभ्रांत घरों के नौनिहालों की " रेव पार्टीयाँ " और " करीना का ज़ीरो फिगर " अब इंडिया में आम है। ....बस आम आदमी ही आम नहीं है। ......' एब्सर्ड ' है।

चीयरलीडर्स को नाचते , कूल्हे झटकाते और " चोली के पीछे क्या है " का जवाब देते देखकर आँठ साल की ' निर्जला ' वैसे ही नाचने लगती है, और अपनी ' वर्किंग वूमन ' माँ से वैसी ही छोटी - छोटी ' ड्रेस ' लाने की ' डिमांड ' करती है। तो भारत की ९ फीसद विकास दर का एहसास होता है।

अब चिंता है तो बस इस ' मिडल क्लास ' की, जो भारत की संस्कृति को लेकर जब देखो रोने लगता है। ....चिंता है तो उन औरतों की जो सिर में आधा किलो लाल सिन्दूर डाले संस्कारों की रट लगाए रहती है। अगर यही सब रहा तो लड़कियाँ कैसे शर्लिन चोपड़ा और करीना की माफिक अपनी देह दिखा पाएंगी। ...कैसे लड़के होठों पर लिपस्टिक लगाए मेट्रोसेक्सुअल बन पायेंगे । अब तो बस आई.पी.एल का ही सहारा है। कम-स-कम चीअरलीडर्स को सार्वजनिक रूप से ही नचवाकर हमें दकियानूसी भारत से ' इनक्रेडिबल ' और आधुनिक इंडिया बनने का ' चांस ' तो दिया।

Monday, 1 September 2008

" जय श्री राम ..... आज के मुख्य समाचार " " क्या एक पत्रकार को धर्मनिर्पेक्ष होना चाहिए ?"


टेलीविजन पर एक समाचार वाचिका आए और बोले," पार्वती माता की जय.... आप देख रहे हैं आज के मुख्य समाचार ...!" तो आपको कैसा लगेगा ? एक अन्य सज्जन बढ़ी दाढ़ी और सिर पर गोल चोटी टोपी ओढे कहे, " अस्सलाम वालेकुम.........अल्ला के फजल-ओ-करम से आप सुन रहे हैं आज की ताज़ा खबरें ....... मैं हूँ मौलवी अमानउल्ला ...! " तो आप उसे क्या कहेंगे ? एक पत्रकार या धार्मिक पत्रकार ?

पत्रकार का काम खबरें देना और उन ख़बरों की व्याख्या करना है। उसमें समाज के हित से जुड़ा निष्पक्ष नजरिया पेश करना बहुत जरुरी होता है। एक पत्रकार को क्या धर्मनिर्पेक्ष ही होना चाहिए ? धर्मनिर्पेक्ष पत्रकार अगर किसी राजनीतिक दल के प्रति अपनी निष्ठा जाहिर करता है तो क्या वह एक धार्मिक पत्रकार से बेहतर है ?

यह सवाल केवल धर्मनिर्पेक्षता का ही नहीं वरन उसके द्रष्टिकोण का है । अपने घर में एक पत्रकार नमाज पढ़े या हनुमान चालीसा, यह उसका निजी निर्णय है। यह उसके पत्रकारिता धर्मं की नैतिकता और मूल्यों के आड़े नहीं आता हैं।

एक मुसलमान पत्रकार हज पर जाने वाले श्रद्धालुओं पर धार्मिक जानकारीनुमा श्रृंखला तैयार करता है। और दूसरा खली की पूर्वनियोजित हार का एक घंटे तक विश्लेषण करता है। .......दूसरे पत्रकार की धर्मनिरपेक्षता क्या सम्मान करने योग्य है ?

वँही हज के प्रति पूर्व से श्रद्धान्वित पहला पत्रकार ...... हज पर जाने वालों की मनोदशा , रहन सहन , सरकारी सब्सिडी और उनका धार्मिक इतिहास बताता है....तो उसका धार्मिक होना भी पत्रकारिता को बेदाग़ रखता है।

पत्रकार का धर्मं उसका पूर्वाग्रही नहीं होना है। उसकी निष्पक्ष विश्लेषणपरकता , उसके धार्मिक होने पर भी उसे धर्मनिरपेक्ष ही साबित करती है। हर धर्म में विश्वास रखने वाला व्यक्ति अपने धर्मं से सीख सकता है कि अपने कर्म को कैसे सबसे ऊपर रखकर चला जाए । विपरीत परिस्थितियों में उसका धर्मं ही उसके ईमान को विचलित होने से रोकता है। जनहितकारी पत्रकारिता में उसका धार्मिक विश्वास ही उसका अंगरक्षक होता है।

Thursday, 28 August 2008

" एक चित्र ...... अनेकों अक्षर " ( एक तस्वीर हज़ार शब्द )








" मोनालिसा की तस्वीर को जिधर से भी देखो , उसकी आँखे हर तरफ़ देखती हैं ..........."

बचपन में ऐसा बहुत सुना। देखने पर सच भी पाया। मंडल कमीशन के दौर में एक तस्वीर बहुत कुछ कह गई। " राजीव गोस्वामी " एक छात्र नेता के अग्निदाह की वह तस्वीर आरक्षण का विरोध करने वाले लाखों छात्रों के करोडों शब्दों को बयाँ कर जाती है। २००२ गोधरा में , अखबारों , टेलीविजन और वेब पर एक तस्वीर सबसे प्रमुख दिखाई देती है। " माथे पर भगवा फीता बांधे , हाथ में नंगी तलवार लहराते हुए , दुबला - पतला दंगाई , जो हलक़ फाड़कर कुछ ज़ाहिर कर रहा है। " शायद दंगा पीड़ितों के नरसंहार की हकीक़त...... जो निर्मम है। शायद क़त्लेआम करने वालों के क्रूर इरादे .... जो घ्रणित है।

समय विशेष की इन तस्वीरों की कहानी की सीमा तो कुछ हज़ार शब्दों पर रुक सकती है , लेकिन पाब्लो पिकासो , लिओनार्दो-दा-विन्ची , रघु राय इनके चित्र तो आज भी मोटे-मोटे थीसिस को आमंत्रित करते हैं। जिससे इन चित्रों की थोड़ी-बहुत बराबरी की जा सके। चे गुवेरा की तिरछी टोपी लगाए , घुँघराले बालों वाली तस्वीर या भगत सिंह की जेल में हथकड़ी पहने बैठे की फोटो । ये रोज़ाना असंख्य युवाओं के कमरों की दीवारों पर चिपकती हैं, उनके टी-शर्टों पर छपतीं हैं, उनके विचारों का निर्धारण कराती हैं, उनकी अभिव्यक्ति का माध्यम बनती हैं। महात्मा गाँधी की तस्वीरें और रूप-आकृतियाँ तो चाय के मगों पर भी छपीं बड़े घरों के डाइनिंग-टेबल की शोभा बढ़ातीं हैं।

किसी चित्र की व्याख्या लाख शब्दों में की जा सकती हैं , लेकिन ज़रूरी नही ....... कि लाख़ शब्दों के आधार पर एक सजीव चित्र अक्षरश बनाया जा सके । आज का टेलीविजन युग चित्रों कि महत्ता को सिरे से बयां करता है। पहलवान खली की एक तस्वीर से लेख़क, एक घंटे के कार्यक्रम की कहानी लिख डालता है।

ग़रीब-अमीर, अनपढ़-साक्षर, महिलाऐं-बच्चे और कभी-कभी तो पशु भी हज़ार शब्दों की बात को एक चित्र से समझ जाते हैं। तस्वीरें भाषा, रंग, देश, काल और सोच का बंधन तोड़ती हैं। एक आदिवासी और एक उच्च - शिक्षित युवा को तस्वीर के रंग और मायने पता हैं। एक-दूसरे के अक्षर नहीं।

प्रकृति से बड़ी चित्रशाला तो शायद क्या होगी। जो रोज़ाना करोड़ों शब्दों के निर्माण को न्यौता देती है। भारत की फिल्में तीन घंटे के समय में १०० साल से भी ज्यादा का जीवन पिरो देती हैं...... केवल चलते चित्रों की वजह से।
अपने इतिहास की व्याख्या हम शब्दों से करते हैं।
क्या यह बिना तस्वीरों के कर पाना सम्भव है